जीवन
जीवन क्या है ? मेरे मस्तिष्क और शायद बहुतों के मस्तिष्क में पैदा ये सवाल वाकई विचारणीय है।
जो मैं देख रहा हूं सामान्य रूप में व्यक्ति का जन्म होना एजुकेशन यानी शिक्षा हासिल करना वह शिक्षा जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना या जो आर्थिक स्थिति को बेहतर करे सरल शब्दों में एक सरकारी या गैर सरकारी पद हासिल करना और फिर तमाम अव्यवस्थाओं का शिकार और हिस्सेदार रहते हुए एक नैतिक पतन की ओर अग्रसर समाज में उपभोक्तावादी चरित्र को अख्तियार करते हुए जीवन के अंतिम समय का इंतजार करना और इस प्रक्रिया के लिए अपनी संतानों को तैयार करके जाना । क्या यही जिंदगी है?
एक इंसान के तौर पर क्या इस तरह का जीवन ही सबसे सही और अच्छा है। जिस समाज में हम सांस लेते हैं हमारे होते हुए उसी समाज में तमाम प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूपों में एक मनुष्य द्वार दूसरे मनुष्य पर किया जाने वाला शोषण कायम है, तमाम सामाजिक असमानता , अवैज्ञानिकता , अन्याय , अत्याचार कायम है , हमारे समाज का आधा हिस्सा यानी स्त्री सामाजिक राजनैतिक सहभागिता से आज भी दूर है, तमाम सामाजिक गैरबराबरी,समाज का बहुत बड़ा हिस्सा संसाधन हीनता में अभावों में जीवन बिताता है और एक हिस्से के लिए सारी सुविधाओं को भरमार है। तमाम पशुवृत्ति हिंसा , बलात्कार, बर्बर सामूहिक बलात्कार, अनन्य जघन्यतम क्रूरतम हिंसा का होना ,यह सब होते हुए सिर्फ अपने बारे में सोचना और जीना यही मानव जीवन होना चाहिए । मनुष्य के इतने विकास और प्रगति के बाद भी विज्ञान की इतनी तरक्की के बाद भी तमाम सामाजिक बुराइयों का आपकी आंखों के सामने होना ।और आपका उसका एक हिस्सा होना । क्या यही जीवन है। आज हमारे पास जो भी है तमाम संसाधन और तमाम प्रौद्योगिकी तमाम विज्ञान तमाम उच्च विचार उपभोग के लिए बेशुमार चीजें बस कुछ पहुंच में कुछ नहीं , जो पहुंज में हैं का उपभोग किया जो नहीं है उससे मुंह मोड़ लिया। क्या यही जीवन है।
भारतीय विश्वविद्यालय के छात्रों युवाओं के मुख यह सुनना की भारतीय आजादी आंदोलन के महान क्रांतिकारियों, मनीषियों को याद करना उनके विचारों को याद करना , याद करना उनके जीवन संघर्ष को , याद करना आजादी के प्रति उनकी ललक को, अच्छाई सच्चाई इंसानियत के प्रति उनके आकर्षण को और उसके लिया अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को एक तुच्छ वस्तु की तरह किए गए महान त्याग को, जुल्म और अत्याचार के प्रति किस तरह लड़ना चाहिए ,इंसानियत के लिए किस हद तक व्यक्तिगत स्वार्थ से मुक्त हुआ जा सकता है भारतीय आजादी आंदोलन ऐसे महान क्रांतिकारियों और मनीषियों से भरा पड़ा है।
यह सब याद करने के लिए वह सवाल करता है ये वे लोग करें जिन्हें इसमें इंटरेस्ट है जिन्हें दिलचस्पी है , सामाजिक जुल्म के खिलाफ़ लड़ने में दिलचस्पी का क्या सवाल है?
ये वो लड़ाई है जो आपके इंसान होने का सबूत है सामाजिक जुल्म, अन्याय और अत्याचार को देखते हुए अनदेखा करना , कहना की ये गलत है पर हम उसके खिलाफ खड़े नहीं हो सकते? क्या यह आपको अंदर आ कचोटता नहीं है? क्या यह सवाल नहीं पैदा होता की अन्याय और जुल्म के रास्ते आजादी आंदोलन रूपी दीवार खड़ी कर जो आजादी आंदोलन के अनन्य क्रांतिकारियों ने अपना पारिवारिक व्यक्तिगत स्वार्थ को संपूर्णता त्याग दिया क्या उन्होंने ये इसलिए किया कि उनकी इसमें दिलचस्पी थी। जुल्म, अन्याय , असत्य और अत्याचार का विरोध करना उसके सामने एक संघर्ष खड़ा करना ये इंसान होने की निशानी है, यह आपको सही मायने में इंसान बनाता है। और इंसान बने रहने के लिए जरूरी है सही को सही बोला जाए और उसके साथ हमेशा खड़ा रहा जाय, गलत को गलत बोला जाए और हमेशा उसके खिलाफ खड़ा हुआ जाय। यही जीवन है यही जिंदगी है।
आखिर दिलचस्पी का सवाल उठाते हुए क्या यह ध्यान में नहीं आता है कि जिस क्षेत्र विशेष में आपको दिलचस्पी है, क्या वह आप हासिल कर पा रहे हैं आज छात्र के सामने आर्थिक आत्मनिर्भरता का सवाल है पर क्या वर्तमान परिस्थितियों में यह सहज है । आखिर इतनी मशक्कत क्यूं हो रही है, क्या वह करियर जिसके लिए आप अपने पारिवारिक सुख रिश्ते त्याग करते हैं तमाम व्यक्तिगत सुख से वंचित रहते हैं , अपना बचपन तक उस खास लक्ष्य को हासिल करने के लिए जिसके लिए दिन रात एक किए दे रहे हैं । उसे मिल जाने की निश्चितता कितनी है वह तमाम अनिश्चितताओं से घिरा हुआ। उसका मिल जाना ऐसा है की लोग इसे किस्मतवाला होना कहते हैं, यानी आपकी काबिलियत नहीं किस्मत तय करती है आपका तथकथित सफलता का हासिल होना । आखिर ऐसी जटिलता , इतनी मारामारी क्यूं, इतनी अफरातफरी क्यों , बेरोजगारी का ये आलम है की उच्च से उच्च शिक्षा हासिल छात्र युवा निम्न से निम्न आर्थिक आत्मनिर्भरता से खुश है निम्न से निम्न पद के लिए आवेदन करता है । ऐसे माहौल में भी ऐसी अव्यवस्था में भी हम बस उम्मीद करते हैं।
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