समाज में व्याप्त एक अटल बुराई
दो विपरीत जिंदगियों का टकराव,समान उम्र, समान आंखें, पर उन आंखों में अलग अलग भाव, चाहत, इच्छाएं ।एक झलक में एक दूसरे की आंखों को पढ़ने की कोशिश। बंद कार की खिड़की से झांकती आंखें जिनमें बेबसी है, दुख है और उम्मीद है की शायद उसकी फैली हथेली एक या दो रुपए बेरुखी या सुखद भावना के साथ रख दिए जाएं या शायद अनंत सवाल हों बंद कार के अंदर की दुनियां के बारे में क्यों, कैसे वह ऐसी जिंदगी की हकदार नहीं या शायद भूख ने सिर्फ जिंदा रहने के मकसद ने उसके ऐसा सोचने की क्षमता को मार दिया हो या उसे बताया गया हो भाग्य के बारे में और इस तरह सोचने के हक ही न हो उसे। बंद कार के दरवाजों के अंदर खुशनुमा चेहरा अचानक मैले कुचैले कपड़े के साथ, भद्दी सी दिखने वाली एक जिंदगी को झांकते हुए, हाथ फैलाए हुए देखकर क्या सोचा होगा। क्या उसमें उनके साथ खेलने ,बोलने , बातें करने जैसी भावना जगी होगी ,जैसे बच्चों में जागती हमउम्र बच्चों को देखकर। समाज में तमाम बदलाव होते हैं,नियम कानून आते हैं, तमाम समाज सेवी, नेता, मंत्री, आते रहते हैं पर इस तरह जिंदगियों का टकराव प्रकृति के नियम की तरह अटल बना रहता है पर यह प्रकृ...