5 Nov 23, sunday
समाज में बढ़ती अमानवीयता, हिंसा, अपराध, बलात्कार, बर्बर हिंसा और ऐसे अपराध जो ऐसे नए हैं की बर्बरता और अपराध की शब्दशाला में ऐसा विभत्स शब्द नहीं है जो उस क्रूरता को व्यक्त कर सके। परंतु जो मैं कहना चाह रहा हूं वह सभी अपराधों के लिए है सभी अमानवीय कृत्यों के लिए है चाहे वह छोटा हो या बहुत विभत्स और बड़ा। आज मेरे नवयुवक साथियों में एक प्रश्न है कि समाज में जो हिंसा , बलात्कार, अमानवीयता बढ़ रही है वो तो रोज रोज होता है इसका विरोध हम कहां तक करें ये तो रोज की घटना है और हमारे विरोध करने से क्या होगा कुछ बदलेगा तो है नहीं। अपराध हिंसा, बलात्कार, अमानवीय विभत्स , कुत्सित कर्म सामान्य हो गए हैं। हृदय को कंपा देने वाली खबरों से भी शरीर पर जूं नहीं रेंगती। जिन पर रेंगती है जो महसूस करते हैं जिनके हृदय भारी होते हैं आंखें नम हो जाती हैं उनके पास भी सवाल है की कब तक करें ये आंखें नम कब तक शोक विलाप करें। जब तक घटनाएं घटती हैं तब तक शोक विलाप करो तुम इंसान हो , भीतर एक हृदय है जो महसूस करता है इसका बार बार अभ्यास करो। बार बार। ये वो इकलौती चीज है जो साबित करती है की तुम इंसान हो । संवेदनाओं...